Monday, 24 November 2008

गांव के मंदिर प्रांगण में

गाँव के मंदिर प्राँगण में
यहां जीर्ण-शीर्ण होते देवालय के सामने
धूप और छाँव का
नृत्य होता रहता है

यहाँ स्लेट छत की झालर से लटके
लकड़ी के झुमके
इतिहास पृष्ठों की तरह
गुम हो गए है

दुपहर बाद की मीठी धूप को छेड़ता
ठण्डी हवा का कोई झोंका
कुछ बचे झुमकों को हिला कर
विस्मृत युग को जगा जाता है

धूप में चमकती है ऊँची कोठी
पहाड़ का विस्मृत युग
देवदार की कड़ियों की तरह
कटे पत्थर की तहों के नीचे
काला पड़ रहा है
बूढे बरगद की पंक्तियों सा
सड़ रहा है
बावड़ी के तल में

इस गुनगुनी धूप में
पुरानी कोठी की छाया कुछ हिलती है
और लम्बी तन कर सो जाती है

10 comments:

Udan Tashtari said...

प्रकाश भाई, आपके इस चिट्ठे का भी हिन्दी चिट्ठाजगत में हार्दिक स्वागत है. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाऐं.

Suresh Chiplunkar said...

ब्लॉग जगत में आपका हार्दिक स्वागत है, मेरी शुभकामनायें…

Jyotsna Pandey said...

चिट्ठाजगत में आपका हार्दिक अभिनन्दन है, आपकी लेखनी का स्वाद लेना शेष है शीघ्र ही एक अन्य टिप्पणी आपके ब्लाग पर होगी !आपसे अनुरोध है कि मेरे ब्लाग पर भी भ्रमण करें और अच्छी या बुरी जैसी भी पाठ्य सामग्री हो टिपण्णी अवश्य दें!

रचना गौड़ ’भारती’ said...

आपने बहुत अच्छा लिखा है ।
भावों की अभिव्यक्ति मन को सुकुन पहुंचाती है।
लिखते रहिए लिखने वालों की मंज़िल यही है ।
कविता,गज़ल और शेर के लिए मेरे ब्लोग पर स्वागत है ।
मेरे द्वारा संपादित पत्रिका देखें
www.zindagilive08.blogspot.com
आर्ट के लिए देखें
www.chitrasansar.blogspot.com

नारदमुनि said...

good, narayan narayan

संगीता पुरी said...

आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है। आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्‍दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्‍दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्‍त करेंगे । हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

Suresh Chandra Gupta said...

बहुत सुंदर रचना है. लिखते रहिये.

Ram Shiv Murti Yadav said...

दुपहर बाद की मीठी धूप को छेड़ता
ठण्डी हवा का कोई झोंका
कुछ बचे झुमकों को हिला कर
विस्मृत युग को जगा जाता है
...very nice.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बहुत सुंदर रचना है! आपको, आपके परिवार एवं मित्रों को गणतंत्र दिवस पर हार्दिक बधाई! वंदे मातरम!

aarkay said...

जीवन में नया और पुराना दोनों की दरकार है . शांति पूर्ण सह अस्तित्व की कामना करती बहुत सुंदर रचना!
बहुत बहुत बधाई !